हिंदी सावली – अध्याय २

।।श्री।।
।। अथ द्वितियोध्याय: ।।

श्री गणेशाय नमः। श्री सरस्वत्यै नमः।
श्री कुलदेवतायै नमः। श्री गुरुभ्यो नमः।

शुरू करू यह अध्याय। नवदुर्गाओं के सहाय।
नौ अवतारों में पाये जाय। दुर्गा माँ के रूप।।१।।

पहला नाम शैलपुत्री। जो साक्षात् पार्वती।
जो हिमालय पर्बत की बेटी। बैल पर बैठी हुई।।२।।

दो हाथ है सजे। कमल और त्रिशूल लिए।
स्थान उस का हिमालय में। उसे प्रणाम करे हम।।३।।

दूसरी ब्रह्मचारिणी। जो तप ओर शील की मूर्ती।
एक हाथ जपमाला थी। दूजे में है कुम्भ लिए।।४।।

दशभुजावाली चंद्रघंटा। यह तीसरा रूप था।
इस रूप में बाटा।ज्ञान और अत्योच्च आनंद।।५।।

चौथा अवतार कुष्मांडा। जो है अष्टभुजा।
शेर है वाहन जिस का। प्रभा जिस की मनोहर।।६।।

स्कन्द माता है पांचवी। सिंह पर बैठी हुई।
चतुर्भुजा तीन आँखोवाली। गोद में स्कन्द बालक लिए।।७।।

कात्यायनी हुई छठी। ऋषी कात्यायन की आस थी।
माँ दुर्गा ही बने बेटी। आस पुरी की इस अवतार में।।८।।

सातवी कालरात्री। जीस की त्वचा नीली सावली।
हाथ में लिये बड़ी छूरी! चतुर्भुजा प्रकट हुई।।९।।

आठवी है महागौरी। जीस की कांती दूध सी गोरी।
बैल है इन की सवारी। शुभ्र वस्त्र परिधान करे।।१०।।

यह करूणा की मूर्ती। जग में फैलाये शांती।
हाथ लिए आती। डमरू और त्रिशूल।।११।।

नववी दुर्गा सिद्धीदात्री। ले आये अष्ट सिद्धी।जो
है कमल में बैठी। चतुर्भुजा से बाॅंटे सिद्धीयाँ।।१२।।

निवेदन करू आठ सिद्धीयाँ। अणिमा, महीमा और गरीमा।
प्राप्ती, प्राकाम्य और लघिमा। इशित्व और वशित्व।।१३।।

नवरात्री के नौ दीन। एक एक दुर्गा का करे पूजन।
क्रम से हर एक दीन। ऐसी नवदुर्गाये पूजे।।१४।।

इन्हें पूजने के बाद। पुरी करे वह आस।
भक्तों के रहे पास। संकट निवारण करे।।१५।।

सद्बुद्धी, नीती और भक्ती। सम्पत्ती के साथ दे शांती।
भक्तों की देख कर भक्ती। प्रसन्न हो देवी माँ।।१६।।

इसी लिए उन का स्मरण करे। सच्चे भाव से शरण जाए।
ताके वह दौड़ कर आये। भक्तों की आस पुरी करने।।१७।।

नवदुर्गाओं को आवाहन करू। ग्रंथ सफल करने कहूँ।
ताके लिखने के बुद्धी पाऊं। मै अज्ञानी बालिका।।१८।।

पिछले अध्याय में किया कथन। कैसे बीता दुर्गा का बचपन।
जैसे हुई वह जवान। चिंतीत हुए नानाजी।।१९।।

मालुस्ते गाव में। बचपन बीते धीरे धीरे।
और फिर यौवन पधारे। चिंता करे नानाजी।।२०।।

गरीबी की हालत में। न मिले ढंग का खाने।
हमेशा रहते चिंता में। आज बीता कल कैसे बीते।।२१।।

चिंता और चीता। अंतर केवल अनुस्वार का।
काम एक ही दोनों का। जलाए मनुष्य मात्र को।।२२।।

एक चीता जो शव जलाए। चिंता उस से भारी है।
मनुष्य का वर्तमान जलाये। दु:खी रखे हमेशा।।२३।।

जब अपार कष्ट करे। तब जाके रोटी मिले।
वर्ना चने मुरमुरे। खा कर करे गुज़ारा।।२४।।

लक्कड़हारी का व्यवसाय। कष्ट रोज़ कीये जाय!
तब रोटी मिल पाय। कमाई ऐसी रोजी पर।।२५।।

आज अगर पैसे मिले। तो शायद कल न मिले।
फिर भूखे पेट सो ले। केवल पानी पीकर।।२६।।

बर्तन माँज कर। कपडे धोये और।
पानी लेने जाए कोसो दूर। कांटे लागत पैरों में।।२७।।

रखने के लिए लाज। एक ही पहेने वस्त्र।
दूसरा पहनने के लिए और। कुछ भी नहीं था।।२८।।

ऐसी थी उन की स्थिती। ऐसे में ब्याह की चिंता थी।
किस भाग्यवान की। अमानत होगी दुर्गा।।२९।।

नानाजी रहते त्रस्त। चिंता में होते व्यस्त।
दुर्गा का जीवन न हो व्यर्थ। अच्छे परिवार में ब्याही जाय।।३०।।

जब दुर्गा के अनुभव स्मरे। नाना नानी की आँख भरे।
दुखी हो जाते बेचारे। दुर्गा के भविष्य की चिंता से ।।३१।।

दुर्गा के भाई और बहने। रहे दुसरे सम्बंधीयों के घर में।
न सम्बन्ध रहे आपस में। माँ के देहांत के पश्चात।।३२।।

नानाजी प्रार्थना करे। “दुर्गा को सुख सम्पत्ती मीले।
भाग्य का दरवाज़ा खुले। ब्याह हो कर घर बसे।।३३।।

देवियों के संग बिताई। एक बार नवरात्री सारी।
समय रहा आरामदायी। स्वर्ग सुख का अस्वाद लिए।।३४।।

स्वयं देवी स्वरुप ऐसी। पर आयु बीते दुःखभरी।
संभाले उसे स्वयं देवी। मै मनुष्य क्या करू”।।३५।।

नानाजी एक वर ढूंढे। जो उम्र से थे बड़े।
नाडसुर के शांताराम सूळे। जिन्हें दुसरे ब्याह की इच्छा थी।।३६।।

नाडसुर गाव के। सुळे देशमुख थे।
शांताराम नाम से।पहचान थी उन की।।३७।।

वे दुर्गा का हाथ मांगे। नानाजी झट से हाँ कहे।
चन्द्र सूर्य के साक्षी से। ब्याह सम्पन्न हो गया।।३८।।

ब्याह के बाद दुर्गा का। जानकी नाम रखा।
स्वभाव कोपीष्ट था। पती शांतारामजी का।।३९।

जब जानकी को पता चले। पहली पत्नी के बारे में।
तब दुःख उठे मन में। बिरह समझ पायी सौतन का।।४०।।

जानकी चाहे शांती। पती से करे बिनती।
क्यों त्यागी पहेली पत्नी। कहे सौतन को वापस लाये।।४१।।

मन देखे बड़ा कितना। सौतन की भी समझे भावना।
और पती से करे याचना। सौतन के वापसी की।।४२।।

पर पती ना माने बात। कोप करे दीन रात।
जानकी रहे सदा शांत। चुपचाप सारा सहेती रहे।।४३।।

गरीबी ने साथ निभाया। पती पर बेकारी की छाया।
उस में चिंता ने सताया। बढ़ती हुए परिवार की।।४४।।

भाग्य की परीक्षा करने।छोड़ा महाराष्ट्र, गए गुजरात में।
पहुंचे गणदेवी गाव में।नौकरी मीली तलाठी की।।४५।।

नौकरी में पैसे थोड़े मिले।जीस में ना घर चले।
खर्च हो जाये पैसे सारे। सगे सम्बंधीयों में।।४६।।

हाल बेहाल था गरीबी से। पानी भरे कोसों दूर से।
पैर सूझे चल चल के। भूक से हाल बुरा हो।।४७।।

गरीबी ने की हालत बुरी। सालों पहने एक ही साड़ी।
पहेने पुरी धोये आधी। सुखाये अपने शरीर पर।।४८।।

दर्जी जो सिलाए कपडे। फेंके कटें हुए तुकडे।
जानकी उठाये वही तुकडे। और चोली सिलाए उस की।।४९।।

ऐसा कारुण्यपूर्ण। जीया जानकी ने जीवन।
वह सून कर पिघले पाषाण। शब्द न मिले लिखने को ।।५०।।

पश्चात नन्द के निधन के। घर लाये बच्चे उस के।
अपने भी बच्चे थे जानकी के। सब का लालन पालन करे।।५१।।

उस में पती की कोपी वृत्ती। जानकी चुपचाप सारा सहती।
आप्तों से थी बड़ी प्रीती। सब से सुव्यवहार करे।।५२।।

ऐसे कष्ट सहे अपार। ऐसे में पती कठोर।
जानकी बहोत हुई बीमार। पती का क्रोध शांत न हो।।५३।।

देह से न जाए ज्वर। अब भरौसा भगवान पर।
राह न बचे कोई और। उठ न पाए बिस्तर से।।५४।।

जब चंपा मौसी आयी घर। कहे “यह ना कोई आम ज्वर।
देवी चम्पावती का है संचार। जानकी के शरीर में।।५५।।

जानकी नहीं बीमार। आनंद से करे व्यवहार।”
देखे जानकी की ओर। कहे “उठो चम्पावती”।।५६।।

जानकी उठ कर बैठी। प्रसन्नता से डोलने लगी।
पहचान जब मिली। चम्पावती देवी की।।५७।।

बिस्तर से उठी जानकी। देवीकृपा से बीमारी भागी।
इस दीन के बाद जागी। किस्मत उस परिवार की।।५८।।

अब हम इस से आगे। जानकी को “माँ” पुकारेंगे।
“माँ” कह कर चलायेंगे।अगला सत्र ग्रंथ का।।५९।।

पती को ‘दादा’ सम्बोधत। दादा नया व्यवसाय स्थापत।
वाहन व्यापार के मध्यस्थ। बन के पैसे कमाए ।।६०।।

खेती करने खरीदी ज़मीन। घर पे बहोत थे आप्त स्वजन।
बरसे देवी का कृपाघन। लाज रखे सब की।।६१।।

एक बार सगे संबंधी आये। आटा भी थोडा रहे।
बेटीयाँ चिंता करने लगे। क्या खिलाये अतिथी को।।६२।।

रोटी का थोड़ा आटा हो। चलनी में माॅं डाले जो।
और हाथ से खेले वो। भरभर के आटा निकले ।।६३।।

बेटियाँ आश्चर्य करे। प्रसन्नता से मन भरे।
उन्हें तब पता चले। माँ सामान्य व्यक्ती नहीं।।६४।।

एक बार माँ के लिए।कंगन सोने के बनवाये।
दादा जब वे ले आये।हस के कहे माँ उन से।।६५।।

कंगन है बड़े सुहाने। पर पता नहीं दिन कितने।
पहन पाउंगी मै हाथ में। आये वैसे जायेंगे।।६६।।

जब सुने यह शब्द। दादा हुए संतप्त।
जब समय आया योग्य। तब समझे अर्थ दादा।।६७।।

कंगन बेच के जो पैसे आये। बड़ा घर खरीद पाए।
पर खुश ना रहे पाए। पिशाच्बाधा थी घर में।।६८।।

बहोत सालो पहेले। राजपूतों के जो युद्ध चले।
उन में जो मृत हुए। वह आत्माएं थी अतृप्त।।६९।।

गाडी थी सम्पत्ती घर के ज़मीन में। सर्प जन्म ले कुछ आत्माएं।
माॅं के घर में नए। उन सापों की थी बस्ती।।७०।।

भूत पिशाच करे परेशान। परिवारवाले करे सहन।
पिशाच प्रयोग एक दीन। दादा की जानपर बीता ।।७१।।

तब माॅं ने संतप्त होकर। महाकाली को आवाहन कर।
सारे भूतों को भगाकर। नदी पार रवाना कीया।।७२।।

तब से हर दिन शाम में। पश्चिम की और आँगन में।
अगरबत्ती लिए हाथ में। ध्यान लगाए जानकी।।७३।।

सायंप्रार्थना करवाए बच्चों से। स्वयं बैठे सामने भगवान के। पश्चीम की ओर देखे। निर्निमिश दृष्टी से।।७४।।

एक दीन शाम को ध्यान लगा कर। माॅं देखे पश्चीम की ओर।
तब आया द्वार पर। एक ज्योतिषी भविष्य कहेने।।७५।।

बेटियाँ उस से कहे। माँ का भविष्य बतायें।
तब ज्योतिषी माँ से कहे। हाथ बताये अपना”।।७६।।

तब माँ निर्देश करे। ऊंगली से बताये पिशाच उसे।
और कहे “आप बताये। भविष्य इस व्यक्ती का”।।७७।।

जैसे ज्योतिषी देखे उस ओर। पसीना पसीना हो जाये डरकर।
असंख्य पिशाच चीखकर। रोये मोक्ष की आस लिए ।।७८।।

तब कहे ज्योतिषी। “काम न करे मेरी मती।
संभाले इन्हें आप ही”। डर से कांपने लगा ।।७९।।

ज्योतिषी डरकर भाग गया। जानकी ने कथन किया।
इतिहास, सुन के बेटियाँ। अचंबित रह गयी ।।८०।।

कहे जानकी माँ “यहाँ। सैन्य की हो ह्त्या।
उन की अतृप्त रहे इच्छा। पिशाच बनाकर रहे वह।।८१।।

रोज़ शाम को मुझे पुकारे। मोक्ष मांगे रोये चिल्लाए।
कहे हम शरण आये। अब हमें मुक्ती दो”।।८२।।

ऐसे कुछ महीने बीत गए। फीर ऋत सावन की आये।
वर्षा होकर बाढ़ आये। वेंगाणीया नदी को ।।८३।।

घर के पास पानी बढे। बहोत सारे साप दीखे।
मदत मांगे माँ से। गणदेवी की सारी स्त्रियाँ।।८४।।

कहे तू देवी का अवतार। बाढ़ का इलाज कर।
सापों से मुक्ती देकर। कर उद्धार इस गाव का।।८५।।

पूजा का तीर्थ हाथ लिए। माँ सारों से कहे।
मेरे संग पानी में चलिए। सात कदमों का अंतर।।८६।।

पानी में साप थे इतने। सारे लोग लगे डर ने।
माँ बढी आगे पानी में। तीर्थ पानी में डालत जाय।।८७।।

कहे “गंगाजी शांती लायें।पिशाचों को मुक्ती दिलाये।
सापों का भी उद्धार किजीये। अपने कृपा प्रसाद से”।।८८।।

पानी कम हुआ धीरे धीरे। साप गायब हुए सारे।
श्री गंगाजी की कृपा से। मोक्ष पाये पिशाच।।८९।।

माँ की महिमा सुनकर। आये सुहागने आस लेकर।
श्रीफल आँचल में डाल कर। माँ करे सत्कार उन का।।९०।।

पूजाघर के कोने में। हमेशा नारियल मिल जाये।
माँ वहाँ से जब एक उठाये। तो दूजा आये अपने आप ।।९१।।

इस कोने में कल्पतरु था। जो भी चाहे माता।
उस कोने में प्रकट होता। पता न चले राज़ किसी को।।९२।।

एक दीन गए दादा पूजाघर। भगवान को करने नमस्कार।
वहाँ नारियल देख कर। बड़े क्रोधित हुए।।९३।।

क्यों यहाँ नारियल जमाये। एक एक उठा कर फेंक दिए।
जैसे फेंक कर वापस आये। दूसरा नारियल हो निर्माण।।९४।।

बहोत बाहर फेंक दिए। पर कोने में फिर से आये।
अंत में दादा थक गए। आश्चर्य हुआ बहोत उन्हें।।९५।।

जानकी से पूछे “है कितने”। माँ हसकर कहे उन्हें।
“हम सारे देवता जितने। उतने होंगे नारियल”।।९६।।

फेके हुए थे जितने। नारियल सब ने गीने।
तो पुरे हज़ार बने। करे दादा क्षमा याचना।।९७।।

माँ नहीं थी पढीलिखी। पर सारी भाषाए अवगत थी।
बहोत सारे गीत गाती। देवियों के वर्णन के ।।९८।।

जब वह झूले पे झूले। लोग सारे आश्चर्य करे।
उन्हें दुर्गा भवानी दिखे। अलंकारों से सजी हुई।।९९।।

जब आये नवरात्री के दीन। करे सुहागनों का पूजन।
सारे सुने मधुर गायन। पता न कहाँ से आये स्वर।।१००।।

लगे उस कमरे के अन्दर। कोई नाचे गरबा खेल कर।
माँ कहे “चुप बैठ कर। देखो देवियों का खेल”।।१०१।।

पैरों के निशान दिखे। कुंकुम से बने हुए।
माँ की आरती करे। भक्त भावविवश होकर।।१०२।।

जैसे पूर्ण हो पूजन। माँ उडाये कुंकुम।
अपने आँचल से हरदम। पता न चले कहाँ से आये।।१०३।।

जो मन से शरण आये। जानकी माँ के चरण लगे।
माँ मिस्री का प्रसाद बांटे। भक्तों पर बरसाए कृपा।।१०४।।

माँ दरिद्री नारायणी। अंबा त्रिलोकस्वामिनी।
दुर्गा महाभवानी। महाशक्ती महाकाली।।१०५।।

स्वर्ग लोक से देवताये। चरण स्पर्श करने आये।
माँ को शरण जाए। हमारी क्या योग्यता।।१०६।।

लीन हो माँ के चरणों में। प्रार्थना करे मन ही मन में।
आस पुरी करेंगी वे। अगर शरण जाओ सच्चे मन से।।१०७।।

जानकी माँ की महिमा अपार। कृपा बरसाए भक्तो पर।
भक्तों की इच्छा पूर्ती कर। आनंद मिले माँ को।।१०८।।

।।ईती श्री जानकी छाया ग्रंथस्य द्वितीयोsध्यायः समाप्तः।।

।।शुभं भवतु।।
।।श्रीरस्तु ।।

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